Tuesday, December 10, 2013

श्री राजराजेश्वर सहस्त्रार्जुन महाराज

  श्री राजराजेश्वर सहस्त्रार्जुन महाराज





 त्रेतायुग मेंमहिष्मती केसंस्थापक चन्द्रवंशी सम्राट महिष्मान की चौथी पीढ़ी मेंकृतवीर्य हुए थे, उनके पुत्र का नाम अर्जुन था। हैहयवंश की दसवीं पीढ़ी में कर्त्तवीर्याजुन नामक सम्राट हुए थे।

भगवान दत्तात्रेय के वरदान से कर्त्तवीर्याजुन को युद्द भूमि में सहस्त्रार्जुन के नाम से भी जाना जाता है। रामायण,महाभारत,वायुपुराण ,मत्स्यपुराण ,देवीभागवत ,आदि पौराणिक ग्रंथों में उनके विषय में उत्कृष्ट उल्लेख पाये जाते हैं। भारत में सात चक्रवर्ती राजा हुए जिनमें सहस्त्रार्जुन एक थे। वह एक महान राजा थे |

उन्होंने एक हजार अश्वमेघ् यज्ञ किये थे। उनकी यज्ञ वेदियां ठोस सोने की बनाई जाती थी जिन्हें वे आचार्य व ब्राम्हणों को भेंट कर देते थे। स्कन्द पुराण में कहा गया है कि भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र ने हैहयवंशीय कर्त्तवीर्याजुन के रूप में जन्म लिया। भविष्य पुराण के अनुसार महाराज कार्त्तवीर्य ने इस पृथ्वी पर पचासी हजार वर्ष तक अखंड शासन किया। महाराज सहस्त्रबाहु कृतिम वर्षा के प्रथम जनक ( आविष्कारकर्ता) थे।

अतः ' प्रत्यक्ष परजन्य ' कहलाते हैं। इन्होंने लंकापति रावण को कैद करके अपनी घुड़साल में बाँध दिया था।  जानऊ में तुम्हार प्रभुताई , सहस्त्रबाहु सन परी लराई ।

 समर बलि सन करि जस पावा ,सुनि कपि वचन विहसि विहरावा।

 रावण को सहस्त्रबाहु जी ने महेश्वर में सहज ही बंदी बना लिया था। रावण के नाना जी ने सहस्त्रबाहु जी से प्रार्थना करके रावण को छुड़ाया था। रावण ने सहस्त्रबाहु के शासनकाल में उनके क्षेत्र में देवी भागवत पुराण के अनुसार एक बार लीलामय भगवन विष्णु ने लक्ष्मी जी को भू लोक में अश्वयोनि में जन्म लेने का शाप दे दिया।लक्ष्मी जी को इससे बहुत क्लेश हुआ ,उनकी प्रार्थना पर भगवान विष्णु ने कहा - देवी यधपि मेरा वचन अन्यथा नहीं हो सकता तथापि कुछ काल तक अश्वयोनि में रहोगी। लक्ष्मी जी ने भूलोक में अश्वयोनि में जन्म लिया फिर एक हजार वर्ष तक भगवान शंकर की आराधना करने पर उनके आशीर्वाद से भगवान विष्णु ने अश्व का रूप धारण किया जिससे कालांतर में देवी लक्ष्मी को एकवीर नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ ,उसी से हैहयवंश की उत्पत्ति हुई। शाप से मुक्त होकर पति के साथ बैकुण्ठ जाते वक्त शिशु को नदीतट के जंगल में छोड़ गईं ,जिसे ययाति के पुत्र तुर्वस ने पाला ,बच्चे का एकवीर ''हैहय '' नामकरण हुआ  एकवीर -एकावली से धर्मनेत्र, धर्मनेत्र -विन्दावती से पुत्र कुन्तिदेव , कुन्तीदेव -विध्यावती के पुत्र सोहति , सोहति -रानी चम्पावती से महिष्मान पुत्र हुआ , महिष्मान -सुभद्रादेवी के पुत्र भद्रदेव , भद्रदेव -दिव्या के पुत्र दुभद्र , दुभद्र -ज्योतिषमति के पुत्र धनद , धनद -राखीदेवी से कृतवीर्य नाम का पुत्र हुआ। कृतवीर्य की पत्नी का नाम कौशली था उनसे चक्रवर्ती राजा राजराजेश्वर सम्पूर्ण पृथ्वी को जीतने वाले कार्तवीर्यार्जुन श्री सहस्त्रबाहु का जन्म कार्तिक शुक्ल सप्तमी सोमवार को हुआ।

 कार्तवीर्यार्जुन भगवान दत्तात्रेय के अनन्य भक्त थे। जब भगवान दत्तात्रेय इन पर प्रशन्न हुए तो इन्होंने उनसे चार वरदान मांगे। प्रथम वर के रूप में अपने लिये एक हजार भुजाएं माँगी । दूसरे वर के रूप में सत्पुरूषों के साथ अधर्म करने वालों के निवारण का अधिकार माँगा।

तीसरे वरदान के रूप में युध्द द्वारा सारी पृथ्वी को जीतकर धर्मानुसार प्रजापालन की क्षमता माँगी और चौथा वरदान यह माँगा कि रणभूमि में मझसे अधिक बलवान के हाथों मेरा बध हो। (मत्स्य जन्म के समय उनके केवल दो हाथ ही थे किन्तु उक्त वरदान के फलस्वरूप

युद्धस्थल में उनके एक सहस्त्रहाथ प्रगट हो जाते थे। वे इतने हाथों का भार भी महसूस नहीं करते थे। शक्ति संपन्न होने पर भी उन्होंने सातों समुद्रों से घिरी हुई पर्वतों सहित सातों दीपों की समग्र पृथ्वी को जीतकर चक्रवर्ती सम्राट की उपाधि प्राप्त की थी।


- सुधा ताम्रकार



हैहय ध्वज - गीत

 हैहय ध्वज - गीत 




फहर - फहर फहरेपताका , लहर - लहर लहरे ।

हैहय ध्वज पूर्वक प्रतीक है।

शूरवीरता शोभनीय है।

शांति सत्यता त्याग तपस्या -

गौरव गुण गहरे ।

फहर - फहर फहरे पताका , लहर - लहर लहरे ।

गौसुत नन्दी वाहन धारे।

सर संधान दुष्ट संहारे ।

यह सिंदूरी वर्ण समन्वय -

के प्रण पर ठहरे।

फहर - फहर फहरे पताका , लहर - लहर लहरे ।

पौराणिक यह वसुन्धरा है ।

इतिहासों की परम्परा है ।

श्री सहस्त्रवाहु की संस्कृति -

की गाथा कहरे ।

फहर - फहर फहरे पताका , लहर - लहर लहरे ।

युग युगान्त तक निर्भय हो ।

द्रण संकल्पी हर हैहय हो ।

उन्न्त मस्तक स्वाभिमान से -

सदा अमर रहरे ।

फहर - फहर फहरेपताका , लहर - लहर लहरे ।


-  सुधा ताम्रकार

Sunday, December 8, 2013

सहस्त्रबाहु जी की आरती

सहस्त्रबाहु जी की  आरती 

|| जय सहस्त्रबाहु देवा,  श्री गणेशाय नमः || 



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जय सहस्त्रबाहु देवा ,

जय सहस्त्रबाहु देवा-जय सहस्त्रबाहु देवा ,

माता जाकी पधिनी -पिता कार्तवीर्या ,

स्मरण को भोग लगे -हैहयवंशीय करें सेवा , 

जय सहस्त्रबाहु देवा ।

 पिता संग माता ने तपस्या में साथ निभाया ,

विष्णु जी से श्रेस्ठ वीर पुत्र का वरदान पाया,

बड़े होने पर पिता ने राजमुकुट पहनाने का विचार बनाया , 

जय सहस्त्रबाहु देवा । 

महर्षि गर्ग से पायी प्रेरणा -दत्तात्रेय की सेवा ,

चार वरदानों का फल पाया -सहस्त्रवाहों का बल पाया ,

धर्म पूर्वक प्रजा पालन एवं रक्षा का सूत्र हाथ आया ,

रण भूमि में जग के श्रेष्ठ यौद्धा से मरने का विश्वास आया , 

जय सहस्त्रबाहु देवा। 

अपना राज्य सात समंदर तक फैलाया ,

जन जन की रक्षा का वचन निभाया ,

रावण को अपनी भुजाओं में बन्दी बनाया ,

सुन्दर कांड में वीर हनुमान से प्रशंसा पाया , 

जय सहस्त्रबाहु देवा। 

एक हजार यज्ञ प्रतिदिन सोनेकी वेदी मेंकरवाया,

धर्म और कर्म मेंजग मेंनाम कमाया,

प्रातः नाम स्मरण करने पर जन जन को ,

युगों से मन वांछित फल दिलवाया,

स्वयं ने जग में राजराजेश्वर का पद पाया , 

जय सहस्त्रबाहु देवा।

''राजराजेश्वर सहस्त्रार्जुन '' की महिमा को देवों ने भी वेदों में गया ,

महेश्वर में पूज्य स्थल बनवाया,

शिवलिंग में तुमको बसाया ,

अग्निदेव ने ''अखण्ड ज्योति ''के रूप में साथ निभाया ,

नर्मदा ने सहस्त्रधारा के संग अपना विशाल रूप दिखलाया ,

जन जन ने महेश्वर को को तीर्थस्थल के रूप में अपनाया , 

जय सहस्त्रबाहु देवा।


- सुधा ताम्रकार, जबलपुर  


Thursday, December 5, 2013

ताम्रकार विवाह की वेबसाइट


ताम्रकार विवाह  की  वेबसाइट 



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Wednesday, July 21, 2010

सभी पाठको के लिए सूचना

ब्लॉग के सभी पाठको को सूचित किया जाता है की इस ब्लॉग में आपकी हर तरह की रचना, लेख, जानकारियां, कवितायेँ एवं परामर्श सदैव आमंत्रित हैं |

रचनाये भेजने के लिए कुछ महत्त्वपूर्ण बातों का ध्यान रखे :-

१. कृपया अपनी मूल रचना ही प्रकाशन हेतु भेजे |

२. अगर किसी और व्यक्ति का लिखा लेख या रचना प्रकाशन हेतु भेज रहे हैं  तो कृपया उस व्यक्ति का नाम भी लिखकर भेजे |

३. रचनाये एडमिनिस्ट्रेटर या मॉडरेटर  के संपादन करने के उपरांत ही प्रकाशित होगी |


आशा है  की हमारी इस कोशिश को साकार रूप देने में आप सभी हमारे साथ मिलकर सहयोग  देंगे |

धन्यवाद

सहस्त्रबाहु महाराज का मंदिर

कहते हैं सहस्त्रबाहु सुदर्शन चक्र का अवतार थे ।
सुदर्शन चक्र का निर्माण सूर्या कि प्रतिभा से विश्वकर्मा जी के द्वारा किया गया था |

नीचे सहस्त्रबहु मंदिर कि छवि है :-

Monday, July 19, 2010

अब आप भी अपने लेख यहाँ प्रस्तुत कर सकते हैं

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अगर आप इस ब्लॉग में अपना कोई लेख प्रस्तुत करना चाहें या अगर आप किसी सम्मेलन या कार्यक्रम का विवरण इंटरनेट के माध्यम से लोगो तक पहुचाना चाहें, या किसी सामाजिक फोटो अथवा वीडियो इस ब्लॉग मे देना चाहें, अथवा किसी भी जानकारी के लिए निम्न पाते में मेल कर सकते हैं :-





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HISTORY OF SAHASTRABAHU



The word Sahasra virtually means a thousand. For many it means the dominance of emperor Arjun over the evil. In mythological art, the pictorial expression of the strength of Gods is depicted with multiple hands and brain power with multiple heads. There are other explanations on the expression of strength of Sahasrarjun in the form of fables and mythical tales. It is the subject of this article. The illustrations presented here are designed in the interest of youngsters, who have little or no direct contact with the main core TAMRAKAR community. However, for reading the text the parents guidance may be required. Hopefully it will arouse curiosity in them over the glories of our past. Pictorially we have presented ten pairs of hands to represent the thousand hands of Sahasrarjun following the original painting by Shri Kale of Gadag. He was inspired by the scriptures on Sahasrarjun on the war front described in Bagvat puraan.
Great emperor Sahasrarjun, the patriarch, ruled the kingdom of Mahismati, the region of Maheshwar in the state of Madya Pradesh, India. He was a well-known Kshatriya warrior, who stood out of other brave heroes of puraans, for his great strength. Sahasrarjun stories have been depicted differently in puraans. Many folklore’s and fables describing his greatness have been passed on for generations. It is mostly from word of mouth. Their interpretations, however, vary in different regions. The fables described here have been collected by personal interviews with the few leaders of the TAMRAKAR community by the author.


Our story begins from the heaven.Resident God Vishnu destroyer of evil, is generally identified by the weapon Chakra. This Chakra symbol adorns his right hand index finger. Pictorially it is shown as a very powerful, sharply spiked, spinning wheel. It spins fast This weapon represents God Chakradeva, the destroyer of evil elements of humanity. The Chakra sometimes in the form of wheel is used as a logo to symbolize our Sahasrarjun heritage. The wheel that represents Chakra is symbolically used in the figures or the book covers of the religious books related to Sahasrarjun.


God Vishnu at the appropriate time sent Chakaradeva to earth as one of his 26 avaatars. That is when there was no peace on earth due to turmoil caused by the rakshas or evil disruptors of the society. He descended to earth to eliminate the rakshasas and disruptors and become great emperor Sahasrarjun.



For generations it has been told that young Kartavirya after becoming the ruler of Mahismati, for the betterment of and for expansion of his kingdom to the four corners of the earth, sought the advice of the elders. Then he went on a quest for peace to a mountain top to pray to the God Dattatreya.


He prayed to him for peace and strength with deep devotion. Dattatreya became his mentor as well as his guru (teacher) and guided him during his entire life.



Dattatreya finally appeared and blessed his devotee with a thousand powerful hands. Mighty Sahasrarjun then conquered all the known and unknown oversea kingdoms. In reference to his powerful hands Sahasrarjun is addressed as Sahasrabahu, Sahasrabujhadhari etc.. He is also referred to as Rajarajeshwar, Kartavirya, Kartyviryarjun, Kritaviryanandan, Parakrami Arjun, Haihayaraja, Dashagrivajayi, Nagapal etc. He was known to be one of the seven greatest emperors that had ever lived.
Ganesh Puraan scriptures describe infant Kartavirya at birth as having no limbs.

Thousands of years ago, due to political and social uncertainties, sahastrabahu migrants from Madyapradesh settled in the Erandon area of Khanadesh where this folklore originated. At Erandon Barhanapur Ganesh lake, in the Ganesh temple, the priest pointed at the paintings. He explained that here on the lake front, Kartavirya’s parents were concerned. They carried their baby Kartavirya with no hands and prayed regularly to God Dattatreya, who then blessed the baby with the thousand hands. Kartavirya came to be known as Sahasrarjun.


Many interpret Sahasra represents hands of Sahasrarjun holding many weapons, expressing his knowledge in different war skills,Artist Kale placed imaginary weapons derived from the mythological depictions in Sahasrarjun’s hands. The author Shri Ajore Sinha of Hai Haya descent in his descriptive verses on Sahasrarjun strength also portrayed many weapons.


Sahasrarjun was accompanied by 500 humongous brave body guards serving him around the clock. Their collective 1000 powerful hands represented another source of his power.


Sahasrarjun had 500 spouses. Their thousand hands also represented his greater strength. Undoubtedly he must have been a patient diplomat to shoulder multiple domestic situations.


Thousand hands, presumably symbolic, represented his superhuman strength. It is common sense that he was a thousand times more powerful. As an example in a duel with fierce Ravana, he defeated the demon effortlessly. Ravana had a mighty physique with 10 pairs of strong hands and ten large heads.

महेश्वर

मध्य प्रदेश में Maheswar शानदार पूर्वज श्री Heheyavansh Sahasrarjun की राजधानी थी, भी SahasraBahu या Kartaviya अर्जुन के रूप में जाना जाता है. Kartavira अर्जुन के लिखित खातों महाभारत, रामायण और पुराणों में पाया जा सकता है. वह दत्तात्रेय का भक्त था. हाल के इतिहास मध्य प्रदेश (आधुनिक Mandu जा रहा है नाम में Mandav Gadh को पता लगाया जाता है). लिखा खातों पुष्टि करते हैं कि Savjis Mandu के शासकों थे और सफलतापूर्वक सदियों के लिए लगातार मुस्लिम भीड़ सामना किया. वहाँ महेश्वर, मध्य प्रदेश में श्री सहस्ररजुन का एक मंदिर है. मंदिर 13 वीं शताब्दी में मुस्लिम हमलों withstanding के बाद बनाया गया था.



सहस्त्रार्जुन को कार्तेयवीर क्यो कहते हैं


वेद बाबू,सहस्त्रार्जुन हहाया वंश के राजा कृतवीरया के पुत्र थे . इशी लिए उन्हे सहस्त्रार्जुन भी कहा जाता है।उनका वास्तवीक नाम अर्जुन था । उन्होने घोर तपशया कर दत्तात्रेय  भगवन को प्रशन्न किया था, और 1000 हाथों का आशीर्वाद प्राप्त किया था, इसलिए इन्हे सहअस्त्राबाहू भी कहा गया है ।  एक बार उन्होंने  रवाँशी युध्य  के बाद रेवन को बाँध दिया था, ताकि बूच्छे बूँढे हुए रवाँ के साथ खेल शेक. पुलत्या ऋषि ने रेवन को छुडवाया था । उष्का और उनके  पुत्रों का वध परशुरंजी ने किया था । 

पाठ ग्यारह - यदुवंश और सहअस्त्रार्जुन की कथा का विवरण

ययाति के ज्येष्ठ पुत्र Yadu चार बेटों-Sahastrajit, Kroshtu, नाला और Nahush था. Sahastrajit एक बेटा है जो Shatajit Haihaya तीन बेटे थे, और था Hehaya Venuhaya. Haihaya के वंश के रूप में धर्म-Dharmanetra-कुंती-Sahajit-Mahishmaan-Bhadrashrenya-Durdabh और Dhanak हुई. Dhanak चार बेटों-Kritveerya, Kritaagni, Kritdharma और Kritauja था.



Kritveerya एक prosessive बेटा अर्जुन था. अर्जुन दत्तात्रेय की उपासना की थी और उनके आशीर्वाद से एक हजार हथियार हासिल कर ली. तब से वह Sahastrarjun के रूप में जाना जाने लगा. दत्तात्रेय उसे पूरी पृथ्वी के नियम की तरह कई अन्य बून्स के साथ ही धन्य था, धार्मिक मायनों में अपने विषयों के द्वारा हत्या को बढ़ावा देने और कुछ मानव सभी तीन संसार में प्रसिद्ध किया जा रहा. उस समय, वहाँ कोई अन्य गुण में Sahastrarjun के बराबर राजा था. वह अस्सी हजार पांच वर्षों के लिए सारी पृथ्वी पर शासन किया.



एक बार उसकी Sahastrarjun नर्मदा का पानी जब वह रावण के साथ एक मुठभेड़ हुआ है पर पिछले समय का आनंद ले रहा था, श्रीलंका के राजा. Sahastrarjun रावण आसानी से कब्जा कर लिया और उसे अपने राज्य में एक अलग जगह पर कैद. Sahastrarjun अहंकार के समय के साथ सारी हदें पार कर दी. वह साधु और अन्य धार्मिक लोगों को आतंकित करने लगे. जब उसके अत्याचारों सहिष्णुता के स्तर के बाद वृद्धि हुई है, भगवान विष्णु परशुराम के रूप में एक आंशिक अवतार लिया, ऋषि के बेटे Jamadagni और रेणुका. बाबा की भविष्यवाणी Richeek अनुसार परशुराम क्षत्रिय के साथ बड़ा हुआ - जैसे गुण. वह वास्तव में था अवतार लिया अहंकारी राजाओं के अत्याचार से धरती से छुटकारा. परशुराम भगवान शिव के अलावा अन्य किसी से हथियारों का प्रशिक्षण प्राप्त किया था. वह बहुत ही अपने पिता के आज्ञाकारी थे और Parashu (कुल्हाड़ी द्वारा मौत की सजा दी अपनी माँ) है कि वह भगवान शिव से अपने पिता की तानाशाही पर प्राप्त किया था. कारण पाठ्यक्रम में परशुराम रावण नहीं मिला ही कैद से रिहा बल्कि Sahastrarjun मार डाला.


Sahastrarjun एक सौ बेटों किसके बीच शूर तक, Shursena, Vrishasena, मधु और Jayadhwaj प्रमुख किया गया था. Jayadhwaj Taaljunga एक बेटा था. Taaljunga एक सौ बेटों जिसे Vitihotra और भारत के बीच प्रमुख रहे थे. भारत फिर से मधु जबकि एक सौ पुत्रा थे जिसे भी सौ पुत्रों के बीच Vrishni प्रमुख था. उनके पूर्वज Yadu के नाम के बाद, इस कबीले के Yaduvansha के रूप में जाना जाने लगा.

श्री सहअस्त्रार्जुन का जीवन चरित्र

श्री कर्ट्वीरया चक्रदेव सहअस्त्रार्जुन शहस्त्रबाहु ईश्वर क चोबीस अवतारो मे से एक सुदर्शन चक्रवातार है. इनका जन्म कार्तिक शुक्ला एकादशी क्रातिका नक्षटरा सोमवार को माता पद्‍मिनी(सर्मा) क उदार से हुआ. सुकृति, पुन्यगंधा, मनोरमा, यमघटा, बसुमति, विष्टभाद्रा, और मृगा आदि इनकी रानियाँ थी. यह बड़े शक्तिशाली योगी, प्रतापी, मेघावी, और दानवीर थे. इनमे एक सहअस्त्रा भुजाओ का बाल था, इसलिए सहअस्त्राबाहु कहलाते थे.
               महाराज सहअस्त्राबाहु ने भगवान दत्तत्रेया जी को अपना गुरु बनाया और उनसे आस्त्रा-शष्तरा संचालन आदि सभी विडयाएं सीखी. सातों द्वीप जीतकर सप्त्दीपेश्वर की उपाधि धारण की. सातों दीपों मे विषिवात सात सौ (700) यगया किए.विजय क उपलक्षा मे विजय स्तंभ स्टफिट करवाए और महतवफनो पूर्ण स्थानो पर मंदिर बनवाए जो अब तक सास-बहू(सहअस्त्रा-बाहू का आपब्रांश) क नाम से विद्यमान है. महाराज सहअस्त्राबाहु कृतिम वर्षा क प्रेताम अविष्कर्ता समझे जाते हैं. इसलिए यह प्रत्यक्षा परजनया कहलाते हैं.
सहअस्त्राबाहु महान शक्तिशाली शशक थे. एक बार अपने परिवार सहित नर्मदा नदी मे जल-क्रीड़ा कर रहे थे. कुछ रुकावट क कारण नदी का प्रताप उल्टा बहने लगा. उधर लंका की और लंका पति रवाँ शिवा पूजन मे टल्लीन था. उल्टे प्रवाह क कारण रवाँ का डेरा बह गया. तब वीरता क अभिमानी रवाँ ने क्रोध करके महाराजा सहअस्त्राबाहु पर चढ़ाई कर दी. खूब भयंकर युधहा हुआ. सहअस्त्राबाहु ने रवाँ को बंदर की तरह बंदी बना लिया. अंत मे रवाँ क पितामह मेहेरिशी पुल्सातया क अनुरोधा पे बंधन मुक्ता किया.
               मेहेरिशी जन्मदग्नि महाराज महाराज सहअस्त्राबाहु क सगे सादु थे. यधयापि जमदग्नि ब्राह्मण पुत्रा थे, किंतु इनकी माता सरस्वती और पत्नी रेणुका दोनो ही क्षत्रिया कन्याएं थी. फलतः जन्मदग्नि पुत्रा परशुराम जी मे क्षत्रियोचितता गुन्नो की प्रधानता थी.
               परशुराम- सहअस्त्राबाहु युधहा परेचीन चार महाभर्तों देवासुर संग्राम, परशुराम-शहस्त्राबाहु युधहा, राम-रवाँ युधहा, और कौरव पांडव युधहा मे एक विशेष स्थान रखते हैं.
               कारटीवीर्या सहअस्त्राबाहु की प्रार्थना पूजा पाठ भारत मे उसी भारंटि होती आई है जिस प्रकार आदि शिव, विष्णु, गणेश आदि देवताओं की पूजा भारत मे प्रचलित है. कहा जाता है की भगवान शायस्त्राबाहु बड़े कठिन कराल हैनजिसका सीधहा करना कोई सरल कारया नही है. इनको सीधहा करने क लिए सर्वा प्रथम आलस्या-उनमान्ड का परित्याग कर आचार विहार से संयुक्ता शुधता पूर्ण रहकर नित्या नियम, सत्या भसन आठवा, ब्रम्हचार आदि व्रत का पालन करना अनिवेरया है.इनके जाप अवाम सीधहा कर लेने से हिंसक पशु आठवा चूर, दुष्ता मनुशो आठवा से भाया हुमेशा जाता रहता है. उकता देवता तस्कर आठवा अराष्ट्रिया लोगो क लिए महाकाल है. यह अपने समाज मे एक मात्रा पुरुष आठवा युग पुसुश थे. प्रजा क सच साधन, क्रशको की उपज बढ़ने क निमितता अपने अर्जुनेया संभव बहुदा नदी का निर्माण किया था जो की आज भी सहअस्त्रवाँ नदी क नाम से उत्तर प्रदेश बदायू जिला मे विद्यमान है.

सतीश कुमार वेर्मा